अंधाधुंध सैन्य खर्च और घटती सामाजिक सुरक्षा: यूरोप में जनआक्रोश के पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी

Jhakasnews
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यूरोप में महासंकट: महंगाई और सरकारी नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उबला जनता का गुस्सा, कई शहरों में सेना तैनात

यूरोप के कई प्रमुख देशों में आसमान छूती महंगाई, जीवन-यापन के बढ़ते खर्च (Cost of Living Crisis) और जनकल्याणकारी नीतियों में कटौती के खिलाफ जनआक्रोश उफान पर है। स्पेन की राजधानी मैड्रिड से लेकर फ्रांस के पेरिस और इटली के मिलान तक लाखों लोग सरकारों की आर्थिक प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए सड़कों पर उतर आए हैं। आसमान छूती महंगाई, बुनियादी चीजों के बढ़ते दाम, घटती सामाजिक सुरक्षा और अंधाधुंध सैन्य खर्च ने आम नागरिकों का जीना दूभर कर दिया है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि कई देशों की सरकारों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सड़कों पर बख्तरबंद गाड़ियां और सेना के जवान उतारने पड़ रहे हैं। कई बड़े शहरों में लगातार हिंसक झड़पें, लूटपाट और आगजनी की घटनाएं देखने को मिल रही हैं। एक के बाद एक कई यूरोपीय देशों में जनता का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है। पूरा यूरोप एक ऐसे संकट से घिर चुका है, जिसका असर आने वाले लंबे समय तक महाद्वीप की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है।

स्पेन: पेंशनर्स और मजदूर संगठनों का ऐतिहासिक मार्च : स्पेन की राजधानी मैड्रिड में पेंशनभोगियों, मजदूर संघों और नागरिक समाज संगठनों ने एक विशाल मार्च निकालकर शहर की रफ्तार थाम दी है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार बढ़ती महंगाई को काबू करने में पूरी तरह नाकाम रही है, जिससे बुजुर्गों का जीवन स्तर बदतर होता जा रहा है।

समानता की मांग: महिला और पुरुष पेंशनभोगियों के बीच मौजूद आर्थिक खाई को तुरंत पाटने की मांग की जा रही है।

पेंशन में सुधार: प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि पेंशन को वास्तविक महंगाई दर (CPI) के अनुपात में बढ़ाया जाए ताकि बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें।

स्वास्थ्य सेवाओं में कटौती का विरोध: सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट में की गई कटौती को वापस लेने के लिए अस्पतालों के कर्मचारी भी इस आंदोलन में शामिल हो गए हैं।

फ्रांस: पेरिस में छात्रों का उग्र ‘जेन-जी’ (Gen-Z) आंदोलन : फ्रांस एक बार फिर बड़े नागरिक संकट से जूझ रहा है। पेरिस की सड़कों पर छात्रों और पुलिस के बीच तीखी झड़पें हुई हैं। इस बार आंदोलन की कमान स्कूल और विश्वविद्यालय के युवाओं (Gen-Z) के हाथों में है।

शिक्षा व्यवस्था पर सवाल: देश में स्कूल और विश्वविद्यालय शिक्षा व्यवस्था में किए गए हालिया सुधारों और नई प्रवेश प्रणाली (Selection Process) का छात्र कड़ा विरोध कर रहे हैं।

हॉस्टल और बुनियादी सुविधाओं की कमी: पेरिस और अन्य बड़े फ्रांसीसी शहरों में छात्रों के लिए सस्ते आवास (Student Housing) का भारी अकाल पड़ गया है।

भविष्य की चिंता: युवाओं का कहना है कि सरकारों की मौजूदा नीतियां उन्हें बेरोजगारी और असुरक्षित भविष्य की ओर धकेल रही हैं, जिसके चलते बुनियादी सुविधाओं के अभाव के खिलाफ यह आक्रोश राष्ट्रीय संकट में बदल चुका है।

इटली: मिलान और तूरिन में हिंसक झड़पें, सेना की तैनाती: इटली के औद्योगिक और प्रमुख शहरों में हालात सबसे ज्यादा विस्फोटक बने हुए हैं। तूरिन और मिलान जैसे शहरों में छात्रों, वामपंथी कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने मेलोनी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

 सेना की टुकड़ियों का मार्च: बिगड़ती कानून-व्यवस्था को संभालने के लिए मेलोनी सरकार को अकेले मिलान शहर में 500 अतिरिक्त सैनिकों की बटालियन और बख्तरबंद गाड़ियां उतारनी पड़ी हैं।

विदेशी और रक्षा नीति पर गुस्सा: प्रदर्शनकारी सरकार द्वारा हथियारों की होड़, अंधाधुंध सैन्य खर्च और युद्ध प्रभावित क्षेत्रों को दी जा रही सैन्य मदद का खुलकर विरोध कर रहे हैं। आम जनता का कहना है कि घरेलू अर्थव्यवस्था को छोड़कर सरकार युद्ध में पैसा बहा रही है।

पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम: ईंधन की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी के कारण परिवहन और रसद महंगी हो गई है, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ता पर पड़ रहा है।

ग्रीस, बेल्जियम और अल्बानिया में भी सुलग रही है चिंगारी: यह संकट केवल तीन बड़े देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा पूरे यूरोपीय महाद्वीप में फैल चुका है। ग्रीस में महंगे किराए और छात्र आवासों (Student Hostels) की भारी कमी के खिलाफ छात्रों ने संसद के सामने ही टेंट लगाकर अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। बेल्जियम और अल्बानिया में भी बढ़ती महंगाई और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी सार्वजनिक सेवाओं के लगातार कमजोर होने के कारण हिंसक प्रदर्शन और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों की खबरें सामने आई हैं।

राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यूरोप में युवाओं, मजदूरों और बुजुर्गों का यह सामूहिक उबाल सिर्फ एक तात्कालिक आर्थिक मंदी का नतीजा नहीं है। इसके पीछे गहरे नीतिगत कारण हैं:

  1. अंधाधुंध सैन्य खर्च बनाम सामाजिक सुरक्षा: पिछले कुछ वर्षों में यूरोपीय देशों ने अपने रक्षा बजट में रिकॉर्ड बढ़ोतरी की है। आलोचकों का कहना है कि रक्षा पर होने वाले इस भारी-भरकम खर्च का सीधा बोझ देश के सामाजिक कल्याण (Social Welfare), पेंशन और स्वास्थ्य बजट पर पड़ा है।
  2. सार्वजनिक व्यवस्था का पतन: सरकारी अस्पतालों, मुफ्त शिक्षा और सार्वजनिक परिवहन जैसे क्षेत्रों से सरकारों द्वारा हाथ खींचने या बजट कम करने से आम जनता में असुरक्षा की भावना पैदा हो गई है।
  3. राजनीतिक अस्थिरता का खतरा: बढ़ती महंगाई और नागरिक असंतोष के कारण आने वाले चुनावों में मौजूदा सरकारों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। दक्षिणपंथी और चरमपंथी दलों का उभार इस असंतोष को भुनाने की कोशिश कर रहा है।

यूरोप की सड़कों पर उबल रहा यह गुस्सा साफ संकेत दे रहा है कि महाद्वीप की जनता अब ‘युद्ध और हथियारों’ के बजाय ‘रोटी, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा’ को प्राथमिकता देने की मांग कर रही है। यदि समय रहते सरकारों ने अपनी नीतियों में आम नागरिकों को केंद्र में नहीं रखा, तो यह आर्थिक संकट एक बड़े राजनीतिक उलटफेर और दीर्घकालिक अस्थिरता में तब्दील हो जाएगा।

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